जयपुर के महारानी कॉलेज में मजार विवाद ने पकड़ा तूल: कांग्रेस ने मांगा ASI सर्वे, BJP ने उठाई हटाने की मांग

जयपुर का यह मजार विवाद अब सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बन चुका है।

जयपुर के महारानी कॉलेज में मजार विवाद ने पकड़ा तूल: कांग्रेस ने मांगा ASI सर्वे, BJP ने उठाई हटाने की मांग

जयपुर के प्रतिष्ठित महारानी कॉलेज परिसर में स्थित तीन मजारों को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। यह मुद्दा अब सियासी रंग ले चुका है, जहां कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (BJP) आमने-सामने हैं। कांग्रेस विधायक अमीन कागज़ी ने इन मजारों को ऐतिहासिक बताते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से सर्वे की मांग की है, वहीं बीजेपी विधायक गोपाल शर्मा ने इन धार्मिक ढांचों को कॉलेज परिसर से हटाने की वकालत की है।

यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब कॉलेज कैंपस में बनी तीन मजारें सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गईं। बढ़ते तनाव को देखते हुए प्रशासन ने कॉलेज गेट पर पुलिस बल की तैनाती कर दी है। अब किसी भी व्यक्ति को बिना अनुमति परिसर में प्रवेश की इजाजत नहीं दी जा रही है। कॉलेज के अंदर और मजारों के पास भी सादी वर्दी में पुलिसकर्मी निगरानी कर रहे हैं।

कांग्रेस का दावा: मजारें 1942 की, लेकिन मालिकाना दस्तावेज नहीं

कांग्रेस विधायक अमीन कागज़ी का कहना है कि ये मजारें कॉलेज की स्थापना से पहले, वर्ष 1942 में बनी थीं। हालांकि उन्होंने यह स्वीकार भी किया कि ये मजारें कॉलेज की भूमि पर स्थित हैं और इन पर किसी परिवार के पास मालिकाना हक के दस्तावेज नहीं हैं।

अमीन कागज़ी ने राज्य सरकार से अपील की है कि इन मजारों को लेकर किसी भी प्रकार की भ्रांति को दूर करने के लिए ASI से इनका सर्वेक्षण कराया जाए, ताकि ऐतिहासिक सच्चाई सामने आ सके।

भाजपा का कड़ा विरोध: शैक्षणिक संस्थान में मजारें नहीं होनी चाहिए

दूसरी ओर, बीजेपी विधायक गोपाल शर्मा ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक ढांचे नहीं होने चाहिए, क्योंकि इससे शिक्षा का माहौल प्रभावित होता है।

उन्होंने मुस्लिम समाज से अपील करते हुए कहा कि उन्हें स्वेच्छा से आगे आकर इन मजारों को हटाने की पहल करनी चाहिए, ताकि समाज में सौहार्द बना रहे और शिक्षा व्यवस्था में बाधा न आए।

कॉलेज प्रशासन और छात्रों की राय

कॉलेज के पंप ऑपरेटर रमेश चंद शर्मा का कहना है कि इनमें से एक मजार काफी पुरानी है, जिसे वह वर्षों से देखता आ रहा है। लेकिन बाकी दो मजारें हाल के 1-2 सालों में ही नजर आई हैं।

वहीं, कॉलेज की कुछ छात्राओं का कहना है कि उन्होंने पहले कभी इन मजारों को नहीं देखा था। ये मजारें कॉलेज प्रिंसिपल के सरकारी आवास के सामने स्थित हैं। चूंकि उस क्षेत्र में छात्राओं का आना-जाना नहीं होता, इसलिए उन्हें इन धार्मिक संरचनाओं की जानकारी नहीं थी।

सरकार की चुप्पी और बढ़ती राजनीति

फिलहाल, राजस्थान सरकार ने इस विवाद पर कोई स्पष्ट रुख नहीं अपनाया है। यह स्पष्ट नहीं है कि इन मजारों को परिसर में ही रहने दिया जाएगा या हटाया जाएगा। इस मुद्दे पर राज्य की राजनीति लगातार गर्म होती जा रही है और अब यह मामला धार्मिक भावना और सरकारी संपत्ति के उपयोग जैसे संवेदनशील सवालों को भी जन्म दे रहा है।

हिंदू संगठनों ने इसे "लैंड जिहाद" करार देते हुए विरोध जताया है, वहीं मुस्लिम संगठनों का कहना है कि धार्मिक स्थलों को हटाना समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है।

आगे क्या?

इस विवाद की आंच अब जयपुर से होते हुए पूरे राजस्थान की राजनीति को प्रभावित कर सकती है। प्रशासन के सामने अब यह चुनौती है कि वह कानून, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक सौहार्द के बीच संतुलन बनाए रखे।

अगर ASI सर्वे होता है और यह साबित होता है कि मजारें ऐतिहासिक हैं, तो उनका संरक्षण जरूरी होगा। लेकिन यदि वे हालिया निर्माण हैं, तो कॉलेज परिसर में धार्मिक गतिविधियों को नियंत्रित करना सरकार की प्राथमिकता बन सकती है।


जयपुर का यह मजार विवाद अब सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बन चुका है। आने वाले दिनों में सरकार के फैसले पर सबकी नजरें टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि सार्वजनिक संस्थानों में धर्म की भूमिका क्या होनी चाहिए।